कांतारा चैप्टर 1: क्षेत्रीय सिनेमा की अभूतपूर्व सफलता और इंडस्ट्री के स्थापित हितों पर मंडराता संकट
भारतीय सिनेमा में कुछ सफलताएं ऐसी होती हैं जो सिर्फ बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि एक स्थापित सिस्टम को चुनौती देती हैं। 2025 में रिलीज़ हुई कांतारा चैप्टर 1 ऐसी ही एक कृति है। जब यह फ़िल्म मात्र 16 करोड़ रुपये के बजट में बनी, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि इसके घोषित प्रीक्वल (जो तकनीकी रूप से चैप्टर 2 होगा) पर 125 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च किस आधार पर किया जा रहा है। परदे पर कांतारा का अनुभव करने के बाद, दर्शक इस बात को पूरी तरह समझ गए कि यह फ़िल्म न सिर्फ़ बजट, बल्कि जुनून और कलात्मकता का एक नया मापदंड स्थापित करती है।
क्लाइमेक्स: एक सांस्कृतिक और सिनेमाई मील का पत्थर
कांतारा चैप्टर 1 को केवल एक कहानी कहना न्यायसंगत नहीं होगा; यह एक गहन सांस्कृतिक अनुभव है। फ़िल्म की सफलता का शिखर उसके अंतिम 15 मिनट में निहित है। ये वे क्षण हैं जो दर्शकों के मन पर एक अमिट छाप छोड़ते हैं, जहाँ लोककथा और सिनेमाई ऊर्जा का अद्भुत समागम देखने को मिलता है। 2025 के सिनेमा हॉल में दर्शकों ने जिस असाधारण ऊर्जा और रोमांच का अनुभव किया, वह भारतीय फ़िल्म इतिहास में दुर्लभ है।
इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसके नायक ऋषभ शेट्टी की बहुमुखी प्रतिभा है। उन्होंने इस प्रोजेक्ट में एक ट्रिपल थ्रेट (Triple Threat) के रूप में काम किया: फ़िल्म का निर्देशन करना, इसकी मार्मिक कहानी लिखना और मुख्य भूमिका में असाधारण अभिनय करना। एक ही व्यक्ति द्वारा इतने बड़े पैमाने पर एक सफल फ़िल्म का सृजन करना, सिनेमा जगत में एक मिसाल बन गया है।
बॉक्स ऑफिस पर एक अपारंपरिक विजय
कांतारा चैप्टर 1 की वित्तीय सफलता ने पारंपरिक बॉक्स ऑफिस गणित को अप्रासंगिक साबित कर दिया। फ़िल्म ने अपने 125 करोड़ रुपये के बजट को महज़ दो दिनों में ही वसूल कर लिया, तीन दिनों के भीतर 200 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया, और जल्द ही 400 करोड़ रुपये के लक्ष्य की ओर अग्रसर थी। यह गति अभूतपूर्व थी।
फ़िल्म के कलेक्शन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह किसी एक क्षेत्र या भाषा पर निर्भर नहीं था। हिंदी बेल्ट में इसका कलेक्शन तीसरे दिन पहले दिन से भी अधिक रहा, जबकि विवादों के बावजूद तेलुगु में भी इसने शानदार प्रदर्शन किया। तमिल और मलयालम में भी इसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। यह सफलता प्रमाणित करती है कि कांतारा ने सच्चे अर्थों में पैन-इंडिया फ़िल्म होने की परिभाषा को सिद्ध किया है।
यह अपार सफलता ही वह मूल कारण है जिसके चलते ऋषभ शेट्टी सिनेमा जगत के स्थापित हितों (Established Interests) के निशाने पर आ गए।
एडवांस बुकिंग का रहस्य और दर्शकों की असली ताकत
इस शानदार कलेक्शन के बीच, डे 4 यानी रविवार को एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिला। आमतौर पर, बड़ी फ़िल्मों के लिए रविवार को मॉर्निंग और आफ्टरनून शोज़ की एडवांस बुकिंग में भारी उछाल आता है। कांतारा के मामले में, रविवार की एडवांस बुकिंग शनिवार की तुलना में कुछ कम रही (जैसे 4,02,000 की तुलना में 3,90,000 टिकट)।
हालांकि, इसने फ़िल्म के कलेक्शन पर कोई असर नहीं डाला। इसके विपरीत, वॉकिंग ऑडियंस (Walk-in Audience) यानी काउंटर से टिकट खरीदने वाले दर्शकों की संख्या इतनी अधिक थी कि मॉर्निंग ऑक्युपेंसी ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। कन्नड़, तमिल और हिंदी वर्जन में उच्च ऑक्युपेंसी दर यह दर्शाती है कि दर्शकों ने बुकिंग के शोर के बजाय फ़िल्म की गुणवत्ता पर भरोसा किया। यह चलन यह स्थापित करता है कि जनता ही सर्वोपरि है (Public Is The King) और वे अब केवल प्री-बुकिंग के आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहते।
अंदरूनी राजनीति और प्रतिभा का दमन
जिस तेज़ी से कांतारा ने सफलता हासिल की, उसी तेज़ी से सिनेमा लॉबी के अंदरूनी हलकों से ऋषभ शेट्टी के करियर को बाधित करने की कोशिशें शुरू हो गईं। यह साबित करता है कि इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं है, बल्कि शब्दों की तलवार से प्रतिभा को चुप कराने का प्रयास भी किया जाता है।
कांतारा की राह में कई तरह की रुकावटें पैदा की गईं:
व्यवस्थित नकारात्मक अभियान: फ़िल्म को नीचा दिखाने के लिए ट्रेलर के समय से ही प्रयास किए गए।
बहिष्कार (Boycott) के प्रयास: जानबूझकर विवादों को हवा देकर क्षेत्रीय स्तर पर बहिष्कार ट्रेंड करवाए गए।
प्रीमियर शोज़ पर रोक: हिंदी बेल्ट में प्रीमियर शोज़ को बाधित किया गया, जिससे शुरुआती कलेक्शन प्रभावित हो।
नकारात्मक और फ़र्ज़ी समीक्षाएँ: फ़िल्म देखे बिना ही इसे ‘बोरिंग’ और ‘जबरन बनाया गया सीक्वल’ बताकर फ़र्ज़ी रिव्यूज डलवाए गए।
सामग्री का लीक: दर्शकों को थिएटर से दूर रखने के लिए सोशल मीडिया पर क्लाइमेक्स सहित महत्वपूर्ण दृश्यों को जानबूझकर वायरल किया गया।
कलेक्शन की सत्यता पर सवाल: फ़िल्म के कलेक्शन के आंकड़ों पर सवाल उठाए गए और ऋषभ शेट्टी पर पैसे के दम पर स्टारडम खरीदने के आरोप लगाए गए।
यह पहली बार नहीं था; इससे पहले भी बेहतरीन फ़िल्मों, जैसे ‘सलार’, के साथ इसी तरह की रणनीति अपनाई गई थी। यह स्थापित करता है कि इंडस्ट्री के कुछ प्रभावशाली वर्ग उन लोगों की सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं जो केवल मेहनत और प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ते हैं।
ऋषभ शेट्टी क्यों हैं एक खतरा?
ऋषभ शेट्टी का टैलेंट उनके सरनेम से बड़ा है, और यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। उनका ट्रैक रिकॉर्ड स्थापित इंडस्ट्री को आईना दिखाता है:
उन्होंने सिर्फ़ 2 करोड़ के बजट से फ़िल्म बनाकर नेशनल अवार्ड जीता।
3 करोड़ में भारत के बेहतरीन क्राइम ड्रामा का निर्माण किया।
125 करोड़ के जोखिम के साथ वह अब कांतारा चैप्टर 2 की घोषणा कर चुके हैं।
उनका यह उदय यह दर्शाता है कि 600 करोड़ रुपये के बड़े बजट वाली फ़िल्में भी विफल हो सकती हैं, जबकि कम बजट में बेहतरीन सिनेमा बनाया जा सकता है। ऋषभ शेट्टी, जो अब हिंदी में छत्रपति शिवाजी महाराज पर और तेलुगु में जय हनुमान जैसे बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने वाले हैं, उस व्यवस्था को चुनौती देते हैं जहाँ गद्दी केवल विरासत के आधार पर मिलती है, न कि योग्यता के आधार पर।
यही कारण है कि सिनेमा के महंगे और अनियंत्रित सिस्टम को बचाने के लिए अभी से ऋषभ शेट्टी की राह को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
निष्कर्ष: अच्छे सिनेमा का समर्थन
इस संघर्ष में दर्शकों की भूमिका निर्णायक है। हर वह व्यक्ति जो अच्छे सिनेमा और सच्चे कलाकारों को पीछे धकेलने की कोशिश कर रहा है, उसे यह एहसास होना चाहिए कि जनता अब सब देख रही है।